कूल्हि कुकुरा जइहन कासी

बेखदी-बदी के बात भइल

बकबक में सगरी रात गइल

फेंकरत बाड़न सत्यानासी

कूल्हि कुकुरा जइहन कासी॥

 

इहाँ-उहाँ ले झोंझ बन्हाता

महिमा सगरों रोज गवाता

फेंकत पासा बाड़न बासी

कूल्हि कुकुरा जइहन कासी ॥

 

लुटलें खइलें गात बनवलें

दिनही घुसि सेन्ह में गवलें

सभके मालुम इनका रासी

कूल्हि कुकुरा जइहन कासी ॥

 

नया-नया कुल ढोंग रचाता

जहाँ-तहाँ बस झूठ बँचाता

सोझवें देखीं लेत उबासी

कूल्हि कुकुरा जइहन कासी ॥

 

रंग-रूप सनमान बिगड़लें

भाषा के अभिमान बिगड़लें

बोलत बेरा उपटल खाँसी

कूल्हि कुकुरा जइहन कासी ॥

 

उमड़ी अब जनता के रेला

बन्न करा झुठिया के खेला

भाषा, बनी गरे के फाँसी

कूल्हि कुकुरा जइहन कासी॥

 

बड़का भइया होस में आवा

अनुसूची के बात चलावा

मन से लगि जा, बात जरा सी

कूल्हि कुकुरा जइहन कासी॥

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

 

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