कविता

कविता कभी रोने या धोने से दिक्कते कम नही होती लहू पानी करो आँसू से मिटटी नम नही होती तपन सूरज में होती है तो तपने लोग लगते हैं तपी हर चीज तो हर बार तापनी नही होती लहू पानी करो आँसू से मिटटी नम नही होती मिलोगे खाक में तो खाक अपने आप को कर दो हुए जो खाक न उनकी तो निशानी नहीं होती कभी रोने या धोने से दिक्कते कम नही होती…

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कूल्हि कुकुरा जइहन कासी

कूल्हि कुकुरा जइहन कासी

बेखदी-बदी के बात भइल बकबक में सगरी रात गइल फेंकरत बाड़न सत्यानासी कूल्हि कुकुरा जइहन कासी॥   इहाँ-उहाँ ले झोंझ बन्हाता महिमा सगरों रोज गवाता फेंकत पासा बाड़न बासी कूल्हि कुकुरा जइहन कासी ॥   लुटलें खइलें गात बनवलें दिनही घुसि सेन्ह में गवलें सभके मालुम इनका रासी कूल्हि कुकुरा जइहन कासी ॥   नया-नया कुल ढोंग रचाता जहाँ-तहाँ बस झूठ बँचाता सोझवें देखीं लेत उबासी कूल्हि कुकुरा जइहन कासी ॥   रंग-रूप सनमान बिगड़लें…

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कहSS! जवन कहै के बा

कहSS! जवन कहै के बा

मन कै टीस हिया कै पीर नगर-डगर के लागल तीर मन के दरद महै के बा। कहSS! जवन कहै के बा॥   दगहिल काहें बाS चुनरिया घर अँगने क फ़िरल नजरिया सभ अनकहल सहै के बा। कहSS! जवन कहै के बा॥   घर बहरा में मिली ताना छाहें नाही रखी जमाना अब अनमने रहै के बा। कहSS! जवन कहै के बा॥   फाँफर चचरा उमिर क बोझ हमरी खातिर केहु न सोझ आँखिन लोर बहै…

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