76वें स्वतंत्रता दिवस पर फहराया तिरंगा

76वें स्वतंत्रता दिवस पर फहराया तिरंगा

15 अगस्त 1947 को हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था। और हम आजाद हो गए थे। इसीलिए 15 अगस्त हम हर साल आजादी का पर्व मानते हैं। इस बार हमारी हमारी आजादी के 75 साल पूरे हो गए और हम ७६वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। इस लिए यह बहुत खास है। इस बार स्वतंत्रता दिवस को बड़ी धूम धाम के साथ मनाया जा रहा है। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने…

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जाति धर्म मायामोह में फंसता मनुष्य

जाति धर्म मायामोह में फंसता मनुष्य

जाति धर्म मायामोह में फंसता मनुष्य . ईश्वर जीव को मनुष्य बनाकर इस धराधाम पर भेजता है वह जीव को हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई बनाकर नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ इंसान बनाकर इस धराधाम पर भेजता है। हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई आदि तो पैदा होने के बाद जीव को बनाया जाता है।जीव जब माँ के उदर से बाहर आता है तो ईश्वर के समान निर्विकार होता है इसीलिए जब बच्चा मुस्कारता है तो कहा जाता…

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मनुष्य जीवन में निरोगी काया का महत्व

मनुष्य जीवन में निरोगी काया का महत्व

मनुष्य जीवन में कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो जीवन को धन्य बना देती है और उनके अभाव में जीवन नर्क जैसा बन जाता है। मनुष्य का सबसे बड़ा कीमती तोहफा स्वास्थ्य यानी सेहत होता है क्योंकि निरोगी काया ईश्वर की बहुत बड़ी नियामत होती है जो सौभाग्यशाली को ही मिलती है।रोगी जीवन नर्क जैसी कष्टदायक एवं निरोगी काया स्वर्ग जैसी सुखदायक होती है। इसी तरह मानव जीवन में संतोष सबसे बड़ा धन होता है…

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मनुष्य जीवन में भाग्य की भूमिका एवं महत्व पर विशेष

मनुष्य जीवन में भाग्य की भूमिका एवं महत्व पर विशेष

इस धराधाम पर आने वाले प्रत्येक मनुष्य की भाग्य एक जैसी नहीं होती है बल्कि हर एक मनुष्य की भाग्य अलग- अलग होती है। मनुष्य को अपनी भाग्य के अनुरूप फल मिलता है।भाग्य अनुसार कोई राजसी जीवन तो कोई भीखमंगा जीवन व्यतीत करता है।वैसे तो पत्थर जड़ होता है और इधर उधर पड़ा रहता है।लेकिन वहीं पत्थर जब भाग्य से किसी मंदिर में मूर्ति बनकर पहुँच जाता है तो वह भगवान बन जाता है और…

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हमें नेता नहीं सृजेता चाहिए

हमें नेता नहीं  सृजेता चाहिए

देश एवं समाज को उन्नत बनाने के लिए तथा उसे श्रेष्ठ और समुन्नत मार्ग पर बढ़ाने के लिए विशिष्ट व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, यह गुरुतर भार सामान्य व्यक्ति नहीं संभाल सकता, इसके लिए प्रतिभाशाली नेतृत्व गुण संपन्न महामानव चाहिए वही समाज को अच्छी दिशा दे सकने में समर्थ हो सकता है। “प्रभावशाली नेता केवल मंच संभालने मात्र से कोई नहीं बन जाता उन्हें कुछ कर्तव्य करने होते हैं और कुछ दायित्व भी निभाने होते…

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सावन शिव और सोमवार पर विशेष

सावन शिव और सोमवार पर विशेष

साल के बारह महीनों में सावन का विशेष महत्व होता है क्योंकि इस महीने में धरती हरी भरी हरियाली से सज धज बिरह एवं मिलन की प्रतीक बन जाती है।यही कारण है कि यह महीना भगवान शिव का प्रिय माह माना जाता है और मान्यता है कि वह पूरे महीने धरती पर विराजमान रहकर भक्तों का कल्याण करते हैं।सावन महीने और उसके चारों सोमवारों के बारे तमाम तरह के प्रसंग प्रचलित हैं। सावन शिव और…

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राष्ट्र कुण्डलिनी

राष्ट्र कुण्डलिनी

सृजन ही प्रकृति की नियति है और नित नया रूप देखना मानव का स्वभाव। समय की गति के साथ हर एक पदार्थ का रूपांतरण होकर नए कलेवर के रूप में बदलता रहता है यदि यंहा पर किसी का अवसान दीखता है तो वह भी नए रूप में प्रस्तुत होने के लिए। भारतीय दर्शन के अनुसार परमात्मा ने सबसे पहले प्राण शक्ति स्वरुप ॐ को प्रकट किया। उससे प्रकाश-ज्ञान का सृजन हुआ। उसी से सृष्टि में…

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प्रकृति के नियंत्रक भी थे पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकृति के नियंत्रक भी थे पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

युगावतार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं माता भगवती देवी शर्मा का इस धरती पर अवतरण इस संसार की बिगड़ती हुई व्यवस्था का संतुलन बनाने के लिए हुआ था। प्रकृति के नियंत्रक भी थे पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य . परन्तु की वस्तु को व्यक्ति ठीक तभी कर सकता है जब वह उसके जर्रे जर्रे से परिचित हो वंहा से उसका तदात्म्य हो चूका हो और फिर आज की व्यवस्था का संतुलन बनाना जंहा पूरा…

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रंगभूमि और आज का यथार्थ

रंगभूमि और आज का यथार्थ

कालजयी साहित्य पुरुष कथाकार प्रेमचंद जी का वह साहित्य जिसने अपने समय में हर पढ़ने वालों में स्वतत्रता की आग पैदा कर दी थी। जिसे समझकर हर व्यक्ति के मन में उन परिस्थियों से लड़ने का भाव पैदा हो गया था। आज उन्ही में से ‘रंग भूमि’ उपन्यास विवादों में है। जिसको पढ़ कर आज के तथा कथित मार्डन लोग यह कहते हैं कि इसमें तो दुःख ही दुःख है , तथा इसके द्वारा प्रेमचंद…

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राजनीतिक नाटक प्रजातंत्र के लिए घातक

राजनीतिक नाटक प्रजातंत्र के लिए घातक

एक समय था जब राजनीती से जुड़े लोग जनांदोलनों का वास्तविक नेतृत्व करते थे। आज स्थितियाँ बदल गई हैं। आज जनांदोलनों का नेतृत्व कम और नाटक ज्यादा होता है। आंदोलन में भाग लेने वाले कार्यकर्त्ता तथा जनता पुलिस लाठियां खाते हैं. आंसू गैस झेलते है और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे नेता जी मुस्कराते हुए टीवी न्यूज चैनलों की ओर हाथ हिलाते हुए ससम्मान एक आरामदेह लग्जरी कार जो गिरफ़्तारी के नाटक अनुसार पहले से…

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